पुस्तकालय / Aesop’s Fables

खरगोश और कछुआ

इनसे जुड़ी कहानी: Aesop

पाठ योजनावर्कशीट

खरगोश और कछुआ

एक खरगोश था। वह हर समय डींग मारता रहता कि वह कितना तेज़ दौड़ता है। कछुए की धीमी चाल पर वह ख़ूब हँसता।

“कछुए भाई, तुम कभी कहीं पहुँचते भी हो?” उसने मुस्कराते हुए पूछा।

“हाँ,” कछुए ने कहा, “और जितना तुम सोचते हो, उससे जल्दी पहुँचता हूँ। चलो, दौड़ हो जाए, सब पता चल जाएगा।”

खरगोश ने इतनी मज़ेदार बात पहले कभी नहीं सुनी थी। सारे जानवर इकट्ठा हो गए, और लोमड़ी ने दौड़ का मार्ग तय कर दिया।

खरगोश तीर की तरह निकला और देखते-ही-देखते आँखों से ओझल हो गया। यह दिखाने के लिए कि कछुआ उसके सामने कुछ भी नहीं, वह एक घने पेड़ की छाँव में लेट गया। “थोड़ी देर झपकी ले लेता हूँ,” उसने कहा। “उसे तो मैं पल भर में पकड़ लूँगा।”

कछुआ अपनी धीमी चाल चलता रहा। न वह रुका, न उसने जल्दी की। एक पाँव के बाद दूसरा पाँव, चलता गया, चलता गया, सोते हुए खरगोश के पास से निकला और लंबे रास्ते पर आगे बढ़ता गया।

जब खरगोश की आँख खुली, तो सूरज ढलने को था। वह पूरी ताक़त से मंज़िल की ओर दौड़ा, पर अब बहुत देर हो चुकी थी। कछुआ पहले ही वहाँ पहुँचकर चुपचाप आराम कर रहा था, और सारे जानवर उसके लिए तालियाँ बजा रहे थे।

सीख
धीरे चलो, पर चलते रहो, जीत तुम्हारी होगी।

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चर्चा के प्रश्न

  1. दौड़ के बीच में खरगोश आराम करने क्यों रुक गया?
  2. कछुआ ऐसा क्या करता है जो खरगोश नहीं करता?
  3. कब जल्दबाज़ी के बजाय धीरे और ध्यान से काम करना बेहतर होता है?

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दूसरी भाषा में पढ़ें

शुभ रात्रि।

कल रात: दो केकड़े।