
पूरी गर्मी एक टिड्डा धूप से नहाए खेतों में गाता और नाचता रहा। पास ही एक चींटी अनाज के दाने ढो-ढोकर अपने बिल तक ले जाती, और बार-बार उसके सामने से गुज़रती।
“आओ, ज़रा रुको और मेरे साथ गाओ!” टिड्डे ने पुकारा। “ऐसे सुहाने दिन इतनी मेहनत क्यों करती हो?”
“मैं सर्दियों के लिए खाना जमा कर रही हूँ,” चींटी ने कहा, “और तुम्हें भी यही करना चाहिए।”
टिड्डा हँस पड़ा। “सर्दी अभी बहुत दूर है, और आज तो खाने की कोई कमी नहीं।”
चींटी अपने काम में लगी रही।
फिर दिन छोटे होने लगे और ठंडी हवाएँ चलने लगीं। खेतों पर बर्फ़ की चादर बिछ गई, और खाने को कुछ भी नहीं बचा। भूख से कमज़ोर टिड्डा चींटी के दरवाज़े पर पहुँचा और थोड़े-से दानों के लिए गिड़गिड़ाने लगा।
चींटियाँ अपने गरम घर में आराम से थीं, और उनके पेट भरे थे। उनके पास वसंत तक का खाना था।
“तुम पूरी गर्मी गाते रहे,” चींटी ने कहा। “अब समझ आया कि मैं मेहनत क्यों कर रही थी।”
आज की मेहनत, कल का सहारा।
विज्ञापन
चर्चा के प्रश्न
- चींटी काम में क्यों लगी रहती है?
- टिड्डा उस पर क्यों हँसता है?
- क्या चींटी को अपना खाना बाँटना चाहिए? क्यों या क्यों नहीं?
विज्ञापन
दूसरी भाषा में पढ़ें
- The Ant and the Grasshopper · English
- The Ant and the Grasshopper · English
- La Cigarra y la Hormiga · Español
- La Cigale et la Fourmi · Français
- Die Grille und die Ameise · Deutsch
- La Cicala e la Formica · Italiano
- A Cigarra e a Formiga · Português
- Ang Langgam at ang Tipaklong · Tagalog
- Стрекоза и муравей · Русский
- Мураха і Коник · Українська
- చీమ మిడత · తెలుగు
- النملة والصرصار · العربية
- مورچه و ملخ · فارسی
- 蚂蚁和蚱蜢 · 中文