पुस्तकालय / Aesop’s Fables

लोमड़ी और अंगूर

इनसे जुड़ी कहानी: Aesop

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लोमड़ी और अंगूर

एक दिन बड़ी गर्मी थी। एक भूखी लोमड़ी बाग़ से होकर जा रही थी कि उसकी नज़र ऊँची बेल पर लटके पके अंगूरों के एक गुच्छे पर पड़ी।

“वाह! सूखे गले के लिए इससे बढ़िया और क्या होगा,” उसने कहा।

वह पीछे हटी, दौड़ी और उछली। उसके जबड़े ख़ाली हवा में खट से बंद हो गए। उसने फिर कोशिश की, और फिर चूक गई।

लोमड़ी घूमी और दूसरी तरफ़ से उछली। वह उछलती रही, उछलती रही, यहाँ तक कि उसकी टाँगें दुखने लगीं और पंजे छिल गए, पर अंगूर हर बार बस ज़रा-सा दूर रह जाते।

आख़िर उसने हार मान ली। नाक ऊँची की और चल दी।

“ये अंगूर तो वैसे भी खट्टे हैं,” उसने कहा। “मुझे चाहिए ही नहीं थे।”

सीख
जो मिल न सके, उसे बुरा कहना आसान है।

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चर्चा के प्रश्न

  1. लोमड़ी अंगूरों को खट्टा क्यों कहती है?
  2. तुम्हें क्या लगता है, क्या लोमड़ी को अपनी बात पर ख़ुद भरोसा है?
  3. कभी-कभी यह मानना मुश्किल क्यों होता है कि कोई काम हमसे नहीं हो पा रहा?

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दूसरी भाषा में पढ़ें

शुभ रात्रि।

कल रात: दो केकड़े।